1. राजिम : छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम रायपुर से 47 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह महानदी के तट पर स्थित है। यहॉ पैरी और सोंढू नदियॉ महानदी में आकर मिलती हैं। माघ पूर्णिमा पर यहॉ प्रतिवर्ष मेला लगता है। जहॉ बड़ी संख्या में धर्मालु पवित्र महानदी में स्नान का पुण्य कमाते हैं। यहॉ भगवान राजीव लोचन का बेहद सुन्दर, प्राचीन मन्दिर है। इसके साथ ही मंदिरों के समूह भी हैं। जिनका विशेष धार्मिक महत्व है। राजीव लोचन मन्दिर के अतिरिक्त यहॉ कुलेश्वर महादेव, राजेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मन्दिर, पंचेश्वर महादेव मन्दिर, भूलेश्वर महादेव मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, वामन वराह मन्दिर, राजिम तेलीन का मन्दिर, दानेश्वर मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, शीतला मन्दिर प्रमुख दर्शनीय हैं, जो अपनी वास्तुकला का परिचय देते है। प्राचीन कथानुसार राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र या पद्मपुर था, जो इसका संबंध राजीव तेलीन, राजीव लोचन तथा जगपाल से जोड़ता है। कथानुसार राजीव तेलीन के पास काले पत्थर की मूर्ति थी। जगपाल ने राजीव तेलीन को सोना देकर मूर्ति प्राप्त कर राजीव लोचन नामक मन्दिर बनवाया। राजीव लोचन मन्दिर जगन्नाथपुरी जाने वाले तीर्थयात्रियों के रास्ते में आने वाले महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है। राजिम के लिये नियमित बस सेवा, रेल्वे लाइन (रायपुर-धमतरी छोटी रेल्वे लाइन) एवं टैक्सयाँ भी रायपुर व अभनपुर से उपलब्ध हैं। राजिम के पास महानदी पर लंबा पुल बन जाने पर बारहमासी सड़क संपर्क स्थापित हो गया है।
2. चंपारण्य : रायपुर से 60 किलोमीटर दूर चम्पारण्य वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी की जन्म-स्थली होने के कारण यह उनके अनुयायियों का प्रमुख दर्शन स्थल है। यहॉ चम्पकेश्वर महादेव का पुराना मन्दिर है। इस मन्दिर के शिवलिंग के मध्य रेखाएँ हैं। जिससे शिवलिंग तीन भागों में बँट गया है, जो क्रमशः गणेश, पार्वती व स्वयं शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
3. डोंगरगढ़ : डोंगरगढ़ हावड़ा-मुंबई रेल्वे मार्ग पर स्थित राजनांदगॉव से 59किमी. दूर है। यहॉ पहाड़ी के ऊपर मॉ बम्लेश्वरी का विशाल मन्दिर है। नवरात्रि में यहॉ अपार जन-समूह माता जी के दर्शन के लिये आते हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजा कामसेन ने करवाया था।
4. दन्तेवाड़ा : बस्तर की आराध्या देवी मॉ दंतेश्वरी की पावन नगरी दंतेवाड़ा है। यह डंकिनी-शंखिनी नदी के संगम पर स्थित है। यह जगदलपुर से 85 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी द्वारा कराया गया था। पुरातात्विक महत्व के इस मन्दिर में मॉ दन्तेश्वरी के दर्शन के लिये भक्तों को सात दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। माता के दर्शनार्थी युवकों को धोती पहनना अनिवार्य होता है। धोती की व्यवस्था मन्दिर में ही रहती है। दन्तेवाड़ा में भैरव बाबा का एक प्रमुख मन्दिर शंखिनी नदी के दूसरे तट पर स्थित है। संगम स्थल पर एक विशाल शिलाखण्ड में एक पद चिह्न माना जाता है। दंतेश्वरी मन्दिर के पास ही आदिवासी समाज के प्रमुख देव भीमा देव जो कि अकाल और बाढ़ से बचाने वाले माने गये हैं। उनकी विशेष प्रतिमा स्थित है।
5. बारसूर : बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर को नागवंशीय राजाओं की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह जगदलपुर दन्तेवाड़ा मार्ग में गीदम से 23किमी. दूर है। यहॉ 11वीं, 12वीं शताब्दी के बत्तीसगा मन्दिर, देवरली मन्दिर, चन्द्रादित्य मन्दिर, मामा-भांजा मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। बारसूर की विशाल गणेश भगवान की प्रतिमा प्रसिद्ध है। नारायण गुड़ी मन्दिर का गरुड़ स्तम्भ व पेद्दम्मा गुड़ी की दुर्गा मूर्ति दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मन्दिर में सुरक्षित है।
6. जदलपुर : चौहानों का प्रसिद्ध नगर जगदलपुर संभागीय व जिला मुख्यालय है। पुरात्व के दृष्टिकोण से जगदलपुर का इतिहास काफी समृद्ध है। वहीं जगदलपुर का प्रसिद्ध राजमहल और उसमें स्थित माई दंतेश्वरी देवी का मन्दिर जगदलपुर का सबसे पवित्र स्थल है। आदिवासी संस्कृति की राजधानी जगदलपुर अपने सांस्कृतिक आयामों के कारण और भी ख्यातिलब्ध है। जगदलपुर का बस्तर दशहरा अपनी विशेष प्राचीन आदिवासी परम्परा का निर्वहन करने के कारण विश्व स्तरीय आदिम उत्सव में स्थान रखता है। इस प्रकार इस प्राचीन नगरी का महत्वपूर्ण स्थान है।
7. कॉंकेर : कॉंकेर का प्राचीन नाम शीला व तामपत्र लेखों में काकरय, काकैर्य, कंकर व कॉंकेर अंकित है। कुछ विद्वानों का मत है कि प्राचीन समय में कांकेर कंकर ऋषि, श्रृंगी ऋषी, कांकेर नगर के मध्य में दूधनदी प्रवाहित होती है। इस नगर के दक्षिण में स्थित मढ़ियापहाड़ पुरातात्विक महत्व लिये हुये है। पहाड़ के उपर पत्थरों से निर्मित सिंहद्वार व किला यहां के समृद्ध इतिहास की एक झलिक प्रस्तुत करते हैं।
8. तुलार : अबूझमाड़ के माड़ क्षेत्र में दो पहाड़ियों के मध्य स्थित शिवलिंग पर सारे समय स्वच्छ, निर्मल जल टपकता रहता है। यहां का प्रसिद्ध शिलिंग तुलार के नाम से जाना जाता है। यह प्रसिद्ध बारसूर नगरी से 42किमी. दूर स्थित है।
9. गुप्तेश्वर : दक्षिण बस्तर में शबरी नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पुरातात्विक उत्खनन के उपरान्त 5वीं, 6वीं शताब्दी के कल्चुरी शासनकाल की मूर्तियां, मन्दिर व बावड़ी आदि मिली हैं। टीलों की खुदाई के उपरान्त शिव मन्दिरों का विशाल समूह निकला है।
10. ढोंढरेपाल : दरभा विकासखण्ड में स्थित यह प्राचीन भारतीय मन्दिर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। त्रिरथ शैली में निर्मित तीन मन्दिरों के समूह के आज मात्र अवशेष रह गये हैं, मगर खण्डहर का हर पत्थर अतीत की सुन्दरता का गुणगान करता परिलक्षित होता है।
11. आरंग : रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर रायपुर से 36 किमी. दूरी पर स्थित आरंग एक प्राचीन नगरी है। सजिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। बाद्य देवल मन्दिर एवं महामाया मन्दिर यहां के पौराणिक मन्दिरों में से एक हैं।
12. रतनपुर : आराध्य मां महामाया शक्तिपीठ की सीपना यहां कल्चुरी नरेश रत्नसेन ने की थी। यहां अनेकों सुन्दर पुराने मन्दिर, जलाशय तथा प्राचीन किले के अवशेष हैं।
13. खल्लारी : महासमुन्द जिले से लगभग 22 किमी। दूर स्थित है। यहां पास की एक पहाड़ी पर एक शिलाखण्ड है, जो सती स्तम्भ का एक भाग प्रतीत होता है। यह सिन्दूर से पुता हुआ है और खल्लारी माता के रुप में पूजनीय है। चैत्र माह में पूर्णिमा को खल्लारी ग्राम में देवी के सम्मान में एक मेला लगता है।
14. सिरपुर : राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर आरंग से 24 किमी. आगे बांयी ओर लगभग 16 किमी. पर सिरपुर स्थित है। प्राचीन काल में इसे श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। 5 वी, से 8 वीं सदी के मध्य यह दक्षिण कोशल की राजधानी था। 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। लगभग 1000 वर्ष पुराना पूर्णतः ईटों से निर्मित यहां का लक्ष्मण मन्दिर, गंधेश्वर महादेव मन्दिर तथा बौद्ध विहार पर्यटकों को विशेष रुप से आकर्षित करता है।
15. शिवरीनारायण : महानदी और जोंक नदी के संगम पर बसा, जांजगीर जिले में स्थित शिवरीनारायण बिलासपुर से 63 किमी. पर स्थित है। यहां प्रसिद्ध विष्णु मन्दिर है। यह शिवरीनारायण से 3 किमी. दूरी पर स्थित है। खरोद में प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर मन्दिर है।
16. भिलाई : दुर्ग से 10 किमी. दूर भिलाई एक औद्योगिक नगरी है। देश का पहला सार्वजनिक इस्पात कारखाना अपनी उन्नत तकनीकी, कौशल व उपकरणों के कारण विशेष दर्शनीय है। भिलाई में 100 एकड़ में एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान व चिड़िया घर मैत्रीबाग पर्यटकों को रोमांचित करता है।
17. मंडवा महल : भोरमदेव से आधा किमी. दूर चौराग्राम के पास पत्थरों से निर्मित शिव मन्दिर है। यह 14वीं शताब्दी का जीर्ण-शीर्ण मन्दिर है । इसकी बाह्य दीवारों पर मैथुन मूर्तियां बनी हुई हैं।
18. मल्हार : बिलासपुर जिले में स्थित पुरातात्विक महत्व का यह ग्राम है। उत्खनन से प्राप्त देउरी मन्दिर, पातालेश्वरी मन्दिर, डिंडेश्वरी मन्दिर यहां पर उल्लेखनीय हैं। देश की प्राचीनतम चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा भी यहां देखने को मिलती है।
१९. तालागॉंव : छत्तीसगढ़ के प्रमुख पुरातात्विक स्थल में से एक तालाग्राम बिलासपुर से 30किमी। दूर मनियारी नदी के तट पर अवस्थित है। देवरानी-जेठानी मन्दिर के अलावा यहां विष्णु की एक विलक्षण प्रतिमा प्राप्त हुई है, जिसके प्रत्येक अंग में जलचर, नभचर व थलचर प्राणियों को दर्शाया गया है।
२० . मैनपाट : इसे छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। यह सरगुजा जिले में स्थित एक पठार है। यह प्राकृतिक रुप से अत्यधिक समृद्ध है। तिब्बती शरणार्थियों के एक बड़े समुदाय को यहां सन् 1962 में बसाया गया है।
21. भोरमदेव : 11 वीं सदी का चन्देल शैली में बना भोरमदेव मन्दिर अपने उत्कृष्ट शिल्प एवं भव्यता की दृष्टि से उच्च कोटि का है। भोरमदेव के प्राचीन मन्दिर इतिहास, पुरातत्व एवं धार्मिक महत्व के स्थल हैं। चारों ओर से सुरम्य पहाड़, नदी एवं वनस्थली की प्राकृतिक शोभा के मध्य स्थित यह मन्दिर अगाध शांति का केन्द्र है। इस मन्दिर का निर्माण नागवंशी राजा रामचन्द्र ने कराया था। भोरमदेव मन्दिर को उत्कृष्ट कला शिल्प एवं भव्यता के कारण छत्तीसगढ़ का खजुराहों कहा जाता है।
22. नारायणपाल का विष्णु मंदिर : इन्द्रावती और नारंगी के संगम के आस-पास अवस्थित नारायणपाल ग्राम जो कि जगदलपुर जिले से लगभग 23 मील दूर है। नागवंशीय वास्तुकला में पल्लवित यह भव्य मन्दिर भगवान विष्णु का है। इसका निर्माण नरेश जगदेक् भूषण की पत्नी ने सन् 1111 में नारायणपाल नामक स्थान में करवाया था। मन्दिर अपने आदर्श बनावट के लिये सुविख्यात है।
23. जांजगीर : बिलासपुर जिले में यह स्थित है। यहां पर भगवान विष्णु का अपूर्ण मन्दिर स्थित है। धमधा (दुर्ग)- यहां पर प्राचीन किला एवं मन्दिर पाया गया है।
24. खैरागढ़ : राजनांदगांव जिले में स्थित है। यहां एशिया का एकमात्र कला व संगीत विश्वविद्यालय स्थित है। जहां संगीत एवं कला की शिक्षा दी जाती है ।
25. खूंटाघाट : बिलासपुर से तकरीबन 40 किमी. दूर खारंग नदी पर बना विशाल बांध है। जिसके बीचो-बीच एक टापू स्थित है। यह एक पिकनिक स्थल है।
26. रुद्री : धमतरी से 12 किमी. दूर गंगरेल बांध के पास बना बांध है। जिसका निर्माण महानदी पर हुआ है। इसे कांकेर नरेश राजा रुद्रदेव ने बनवाया था। यह कबीर पंथीयों का धार्मिक स्थल है। यहां का कुद्रेश्वर महादेव यज्ञ मन्दिर प्रसिद्ध है।
27. तान्दुला : दुर्ग जिले में बालोद के पास बना विशाल बांध है। जिसका निर्माण तान्दुला नदी पर हुआ है।
28. नागपुरा : दुर्ग जिले में स्थित नागपुरा जैनियों का धार्मिक स्थल है। यहां पर श्री उवसंम्हार पार्श्वतीर्थ का प्राचीन जैन मन्दिर स्थित है।
29. बालोद : यह भी दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का सती का चबूतरा एवं प्राचीन किला प्रसिद्ध है। इसी के पास में झलमला स्थित है। जहां पर गंगा मैया का प्रसिद्ध मन्दिर है। हर 6 महीने में यहां पर नवरात्रि में मेला भरता है।
30. खरखरा : यह दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का 1128 मीटर लम्बा मिट्टी का बना बांध प्रसिद्ध है।
31. देव-बालौदा : यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
32. सिंघोड़ा : यह सरायपाली, महासमुंद जिले में स्थित है। यहां सिंघोड़ा देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
33. तुरतुरिया : यह महासमुंद जिले में है। यहां बहरिया ग्राम के पास बाल्मीकी आश्रम स्थित है। यहां का काली मन्दिर भी प्रसिद्ध है।
34. पलारी : यह बलौदा बाजार के पास स्थित है। यहां का ईंटों से बना सिद्धेश्व मन्दिर प्रसिद्ध है।
35. गिरोधपुरी : यह संत घासीदास की जन्म-स्थली है।
36. दामाखेड़ा : यह सिमगा, रायपुर के पास स्थित है। यहां कबीरपंथियों की पीठ स्थित है।
37. सिहावा : यह नगरी से 8 किमी. दूर स्थित है। श्रृंगी ऋषि पर्वत से छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी का उद्गम हुआ है। यहां के अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में कर्णेश्वर महादेव, मातागुड़ी, मोखला मांझी एवं भिम्बा महाराज है।
38. चंदखुरी : यह रायपुर के पास स्थित है। यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है। रविशंकर जलाशयः- यह धमतरी से 13 किमी. दूर स्थित महानदी पर बना विशालकाय बांध है। इसे गंगरेल के नाम से भी जानते हैं। यह एक पिकनिक स्थल के पुर में भी विकसित हो चुका है।
39. केशकाल घाटी : यह बस्तर जिले में स्थित है। 5 किमी. लम्बी सर्पाकार घाटी, राष्ट्रीय स्मारक गढ़धनोरा, कोपेन कोन्हाड़ी में चौथी शताब्दी की प्राचीन गणेश मूर्ति इसकी प्रसिद्धि का कारण हैं। घाटी की समाप्ति पर उपर स्थित पंचवटी घाटी की मनोरम छंटा बिखेरता हैं।
40. ऋषभ तीर्थ गुंजी व शक्ति : बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का तमउदहरा झरना, पंचवटी एवं गिद्ध पर्वत प्रसिद्ध है।
41. पाली : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का 9 वीं शताब्दी का शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
42. लाफागढ़ : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। मेकाल पर्वत की उंची चोटी पर किला व जटाशंकरी नदी का उद्गम स्थल प्रसिद्ध है। यह कलचुरियों की प्रथम राजधानी रही है।
43. धनपुर : बिलासपुर जिले में स्थित धनपुर जैन तीर्थकर की मूर्ति एवं प्राचीन मन्दिर के लिये विख्यात है।
44. कोरबा : यहां पर भारत का सबसे बड़ा ताप विद्युत गृह एवं एल्युमीनियम का कारखाना स्थित है।
45. चांग-भखार : सरगुजा जिले में स्थित चांग-भखार कलचुरी व चौहानकालीन मठों व मन्दिर के पुरावशेषों के लिये प्रसिद्ध है।
46. बैलाडीला : बस्तर जिले में स्थित बैलाडीला की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं। यहां का लोहा जापान को निर्यात किया जाता है।
47. बिलाई माता : धमतरी नगर में स्थित बिलाई माता का मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। प्रत्येक नवरात्रि में यहां मेला लगता है ।
48. बिरकोनी : महासमुंद जिले में स्थित है। यहां का चण्डीमाता का मन्दिर प्रसिद्ध है।
49. चंडी-डोंगरी : बागबाहरा के पास स्थित चण्डी-डोंगरी चण्डीमाता की विशाल प्रतिमा के कारण प्रसिद्ध है।
50. ब्राह्मनी : यह महासमुंद जिले में स्थित है। यहां पर बह्नेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर व श्वेत गंगा नामक जल-कुण्ड प्रसिद्ध है।
स्रोत : विकिपीडिया
बुधवार, 10 जून 2009
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