बुधवार, 10 जून 2009

पुरातात्विक व धार्मिक

1. राजिम : छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम रायपुर से 47 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह महानदी के तट पर स्थित है। यहॉ पैरी और सोंढू नदियॉ महानदी में आकर मिलती हैं। माघ पूर्णिमा पर यहॉ प्रतिवर्ष मेला लगता है। जहॉ बड़ी संख्या में धर्मालु पवित्र महानदी में स्नान का पुण्य कमाते हैं। यहॉ भगवान राजीव लोचन का बेहद सुन्दर, प्राचीन मन्दिर है। इसके साथ ही मंदिरों के समूह भी हैं। जिनका विशेष धार्मिक महत्व है। राजीव लोचन मन्दिर के अतिरिक्त यहॉ कुलेश्वर महादेव, राजेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मन्दिर, पंचेश्वर महादेव मन्दिर, भूलेश्वर महादेव मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, वामन वराह मन्दिर, राजिम तेलीन का मन्दिर, दानेश्वर मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, शीतला मन्दिर प्रमुख दर्शनीय हैं, जो अपनी वास्तुकला का परिचय देते है। प्राचीन कथानुसार राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र या पद्मपुर था, जो इसका संबंध राजीव तेलीन, राजीव लोचन तथा जगपाल से जोड़ता है। कथानुसार राजीव तेलीन के पास काले पत्थर की मूर्ति थी। जगपाल ने राजीव तेलीन को सोना देकर मूर्ति प्राप्त कर राजीव लोचन नामक मन्दिर बनवाया। राजीव लोचन मन्दिर जगन्नाथपुरी जाने वाले तीर्थयात्रियों के रास्ते में आने वाले महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है। राजिम के लिये नियमित बस सेवा, रेल्वे लाइन (रायपुर-धमतरी छोटी रेल्वे लाइन) एवं टैक्सयाँ भी रायपुर व अभनपुर से उपलब्ध हैं। राजिम के पास महानदी पर लंबा पुल बन जाने पर बारहमासी सड़क संपर्क स्थापित हो गया है।
2. चंपारण्य : रायपुर से 60 किलोमीटर दूर चम्पारण्य वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी की जन्म-स्थली होने के कारण यह उनके अनुयायियों का प्रमुख दर्शन स्थल है। यहॉ चम्पकेश्वर महादेव का पुराना मन्दिर है। इस मन्दिर के शिवलिंग के मध्य रेखाएँ हैं। जिससे शिवलिंग तीन भागों में बँट गया है, जो क्रमशः गणेश, पार्वती व स्वयं शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
3. डोंगरगढ़ : डोंगरगढ़ हावड़ा-मुंबई रेल्वे मार्ग पर स्थित राजनांदगॉव से 59किमी. दूर है। यहॉ पहाड़ी के ऊपर मॉ बम्लेश्वरी का विशाल मन्दिर है। नवरात्रि में यहॉ अपार जन-समूह माता जी के दर्शन के लिये आते हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजा कामसेन ने करवाया था।
4. दन्तेवाड़ा : बस्तर की आराध्या देवी मॉ दंतेश्वरी की पावन नगरी दंतेवाड़ा है। यह डंकिनी-शंखिनी नदी के संगम पर स्थित है। यह जगदलपुर से 85 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी द्वारा कराया गया था। पुरातात्विक महत्व के इस मन्दिर में मॉ दन्तेश्वरी के दर्शन के लिये भक्तों को सात दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। माता के दर्शनार्थी युवकों को धोती पहनना अनिवार्य होता है। धोती की व्यवस्था मन्दिर में ही रहती है। दन्तेवाड़ा में भैरव बाबा का एक प्रमुख मन्दिर शंखिनी नदी के दूसरे तट पर स्थित है। संगम स्थल पर एक विशाल शिलाखण्ड में एक पद चिह्न माना जाता है। दंतेश्वरी मन्दिर के पास ही आदिवासी समाज के प्रमुख देव भीमा देव जो कि अकाल और बाढ़ से बचाने वाले माने गये हैं। उनकी विशेष प्रतिमा स्थित है।
5. बारसूर : बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर को नागवंशीय राजाओं की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह जगदलपुर दन्तेवाड़ा मार्ग में गीदम से 23किमी. दूर है। यहॉ 11वीं, 12वीं शताब्दी के बत्तीसगा मन्दिर, देवरली मन्दिर, चन्द्रादित्य मन्दिर, मामा-भांजा मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। बारसूर की विशाल गणेश भगवान की प्रतिमा प्रसिद्ध है। नारायण गुड़ी मन्दिर का गरुड़ स्तम्भ व पेद्दम्मा गुड़ी की दुर्गा मूर्ति दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मन्दिर में सुरक्षित है।
6. जदलपुर : चौहानों का प्रसिद्ध नगर जगदलपुर संभागीय व जिला मुख्यालय है। पुरात्व के दृष्टिकोण से जगदलपुर का इतिहास काफी समृद्ध है। वहीं जगदलपुर का प्रसिद्ध राजमहल और उसमें स्थित माई दंतेश्वरी देवी का मन्दिर जगदलपुर का सबसे पवित्र स्थल है। आदिवासी संस्कृति की राजधानी जगदलपुर अपने सांस्कृतिक आयामों के कारण और भी ख्यातिलब्ध है। जगदलपुर का बस्तर दशहरा अपनी विशेष प्राचीन आदिवासी परम्परा का निर्वहन करने के कारण विश्व स्तरीय आदिम उत्सव में स्थान रखता है। इस प्रकार इस प्राचीन नगरी का महत्वपूर्ण स्थान है।
7. कॉंकेर : कॉंकेर का प्राचीन नाम शीला व तामपत्र लेखों में काकरय, काकैर्य, कंकर व कॉंकेर अंकित है। कुछ विद्वानों का मत है कि प्राचीन समय में कांकेर कंकर ऋषि, श्रृंगी ऋषी, कांकेर नगर के मध्य में दूधनदी प्रवाहित होती है। इस नगर के दक्षिण में स्थित मढ़ियापहाड़ पुरातात्विक महत्व लिये हुये है। पहाड़ के उपर पत्थरों से निर्मित सिंहद्वार व किला यहां के समृद्ध इतिहास की एक झलिक प्रस्तुत करते हैं।
8. तुलार : अबूझमाड़ के माड़ क्षेत्र में दो पहाड़ियों के मध्य स्थित शिवलिंग पर सारे समय स्वच्छ, निर्मल जल टपकता रहता है। यहां का प्रसिद्ध शिलिंग तुलार के नाम से जाना जाता है। यह प्रसिद्ध बारसूर नगरी से 42किमी. दूर स्थित है।
9. गुप्तेश्वर : दक्षिण बस्तर में शबरी नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पुरातात्विक उत्खनन के उपरान्त 5वीं, 6वीं शताब्दी के कल्चुरी शासनकाल की मूर्तियां, मन्दिर व बावड़ी आदि मिली हैं। टीलों की खुदाई के उपरान्त शिव मन्दिरों का विशाल समूह निकला है।
10. ढोंढरेपाल : दरभा विकासखण्ड में स्थित यह प्राचीन भारतीय मन्दिर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। त्रिरथ शैली में निर्मित तीन मन्दिरों के समूह के आज मात्र अवशेष रह गये हैं, मगर खण्डहर का हर पत्थर अतीत की सुन्दरता का गुणगान करता परिलक्षित होता है।
11. आरंग : रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर रायपुर से 36 किमी. दूरी पर स्थित आरंग एक प्राचीन नगरी है। सजिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। बाद्य देवल मन्दिर एवं महामाया मन्दिर यहां के पौराणिक मन्दिरों में से एक हैं।
12. रतनपुर : आराध्य मां महामाया शक्तिपीठ की सीपना यहां कल्चुरी नरेश रत्नसेन ने की थी। यहां अनेकों सुन्दर पुराने मन्दिर, जलाशय तथा प्राचीन किले के अवशेष हैं।
13. खल्लारी : महासमुन्द जिले से लगभग 22 किमी। दूर स्थित है। यहां पास की एक पहाड़ी पर एक शिलाखण्ड है, जो सती स्तम्भ का एक भाग प्रतीत होता है। यह सिन्दूर से पुता हुआ है और खल्लारी माता के रुप में पूजनीय है। चैत्र माह में पूर्णिमा को खल्लारी ग्राम में देवी के सम्मान में एक मेला लगता है।
14. सिरपुर : राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर आरंग से 24 किमी. आगे बांयी ओर लगभग 16 किमी. पर सिरपुर स्थित है। प्राचीन काल में इसे श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। 5 वी, से 8 वीं सदी के मध्य यह दक्षिण कोशल की राजधानी था। 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। लगभग 1000 वर्ष पुराना पूर्णतः ईटों से निर्मित यहां का लक्ष्मण मन्दिर, गंधेश्वर महादेव मन्दिर तथा बौद्ध विहार पर्यटकों को विशेष रुप से आकर्षित करता है।
15. शिवरीनारायण : महानदी और जोंक नदी के संगम पर बसा, जांजगीर जिले में स्थित शिवरीनारायण बिलासपुर से 63 किमी. पर स्थित है। यहां प्रसिद्ध विष्णु मन्दिर है। यह शिवरीनारायण से 3 किमी. दूरी पर स्थित है। खरोद में प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर मन्दिर है।
16. भिलाई : दुर्ग से 10 किमी. दूर भिलाई एक औद्योगिक नगरी है। देश का पहला सार्वजनिक इस्पात कारखाना अपनी उन्नत तकनीकी, कौशल व उपकरणों के कारण विशेष दर्शनीय है। भिलाई में 100 एकड़ में एक अत्यन्त सुन्दर उद्यान व चिड़िया घर मैत्रीबाग पर्यटकों को रोमांचित करता है।
17. मंडवा महल : भोरमदेव से आधा किमी. दूर चौराग्राम के पास पत्थरों से निर्मित शिव मन्दिर है। यह 14वीं शताब्दी का जीर्ण-शीर्ण मन्दिर है । इसकी बाह्य दीवारों पर मैथुन मूर्तियां बनी हुई हैं।
18. मल्हार : बिलासपुर जिले में स्थित पुरातात्विक महत्व का यह ग्राम है। उत्खनन से प्राप्त देउरी मन्दिर, पातालेश्वरी मन्दिर, डिंडेश्वरी मन्दिर यहां पर उल्लेखनीय हैं। देश की प्राचीनतम चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा भी यहां देखने को मिलती है।
१९. तालागॉंव : छत्तीसगढ़ के प्रमुख पुरातात्विक स्थल में से एक तालाग्राम बिलासपुर से 30किमी। दूर मनियारी नदी के तट पर अवस्थित है। देवरानी-जेठानी मन्दिर के अलावा यहां विष्णु की एक विलक्षण प्रतिमा प्राप्त हुई है, जिसके प्रत्येक अंग में जलचर, नभचर व थलचर प्राणियों को दर्शाया गया है।
२० . मैनपाट : इसे छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। यह सरगुजा जिले में स्थित एक पठार है। यह प्राकृतिक रुप से अत्यधिक समृद्ध है। तिब्बती शरणार्थियों के एक बड़े समुदाय को यहां सन् 1962 में बसाया गया है।
21. भोरमदेव : 11 वीं सदी का चन्देल शैली में बना भोरमदेव मन्दिर अपने उत्कृष्ट शिल्प एवं भव्यता की दृष्टि से उच्च कोटि का है। भोरमदेव के प्राचीन मन्दिर इतिहास, पुरातत्व एवं धार्मिक महत्व के स्थल हैं। चारों ओर से सुरम्य पहाड़, नदी एवं वनस्थली की प्राकृतिक शोभा के मध्य स्थित यह मन्दिर अगाध शांति का केन्द्र है। इस मन्दिर का निर्माण नागवंशी राजा रामचन्द्र ने कराया था। भोरमदेव मन्दिर को उत्कृष्ट कला शिल्प एवं भव्यता के कारण छत्तीसगढ़ का खजुराहों कहा जाता है।
22. नारायणपाल का विष्णु मंदिर : इन्द्रावती और नारंगी के संगम के आस-पास अवस्थित नारायणपाल ग्राम जो कि जगदलपुर जिले से लगभग 23 मील दूर है। नागवंशीय वास्तुकला में पल्लवित यह भव्य मन्दिर भगवान विष्णु का है। इसका निर्माण नरेश जगदेक् भूषण की पत्नी ने सन् 1111 में नारायणपाल नामक स्थान में करवाया था। मन्दिर अपने आदर्श बनावट के लिये सुविख्यात है।
23. जांजगीर : बिलासपुर जिले में यह स्थित है। यहां पर भगवान विष्णु का अपूर्ण मन्दिर स्थित है। धमधा (दुर्ग)- यहां पर प्राचीन किला एवं मन्दिर पाया गया है।
24. खैरागढ़ : राजनांदगांव जिले में स्थित है। यहां एशिया का एकमात्र कला व संगीत विश्वविद्यालय स्थित है। जहां संगीत एवं कला की शिक्षा दी जाती है ।
25. खूंटाघाट : बिलासपुर से तकरीबन 40 किमी. दूर खारंग नदी पर बना विशाल बांध है। जिसके बीचो-बीच एक टापू स्थित है। यह एक पिकनिक स्थल है।
26. रुद्री : धमतरी से 12 किमी. दूर गंगरेल बांध के पास बना बांध है। जिसका निर्माण महानदी पर हुआ है। इसे कांकेर नरेश राजा रुद्रदेव ने बनवाया था। यह कबीर पंथीयों का धार्मिक स्थल है। यहां का कुद्रेश्वर महादेव यज्ञ मन्दिर प्रसिद्ध है।
27. तान्दुला : दुर्ग जिले में बालोद के पास बना विशाल बांध है। जिसका निर्माण तान्दुला नदी पर हुआ है।
28. नागपुरा : दुर्ग जिले में स्थित नागपुरा जैनियों का धार्मिक स्थल है। यहां पर श्री उवसंम्हार पार्श्वतीर्थ का प्राचीन जैन मन्दिर स्थित है।
29. बालोद : यह भी दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का सती का चबूतरा एवं प्राचीन किला प्रसिद्ध है। इसी के पास में झलमला स्थित है। जहां पर गंगा मैया का प्रसिद्ध मन्दिर है। हर 6 महीने में यहां पर नवरात्रि में मेला भरता है।
30. खरखरा : यह दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का 1128 मीटर लम्बा मिट्टी का बना बांध प्रसिद्ध है।
31. देव-बालौदा : यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
32. सिंघोड़ा : यह सरायपाली, महासमुंद जिले में स्थित है। यहां सिंघोड़ा देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
33. तुरतुरिया : यह महासमुंद जिले में है। यहां बहरिया ग्राम के पास बाल्मीकी आश्रम स्थित है। यहां का काली मन्दिर भी प्रसिद्ध है।
34. पलारी : यह बलौदा बाजार के पास स्थित है। यहां का ईंटों से बना सिद्धेश्व मन्दिर प्रसिद्ध है।
35. गिरोधपुरी : यह संत घासीदास की जन्म-स्थली है।
36. दामाखेड़ा : यह सिमगा, रायपुर के पास स्थित है। यहां कबीरपंथियों की पीठ स्थित है।
37. सिहावा : यह नगरी से 8 किमी. दूर स्थित है। श्रृंगी ऋषि पर्वत से छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी का उद्गम हुआ है। यहां के अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में कर्णेश्वर महादेव, मातागुड़ी, मोखला मांझी एवं भिम्बा महाराज है।
38. चंदखुरी : यह रायपुर के पास स्थित है। यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है। रविशंकर जलाशयः- यह धमतरी से 13 किमी. दूर स्थित महानदी पर बना विशालकाय बांध है। इसे गंगरेल के नाम से भी जानते हैं। यह एक पिकनिक स्थल के पुर में भी विकसित हो चुका है।
39. केशकाल घाटी : यह बस्तर जिले में स्थित है। 5 किमी. लम्बी सर्पाकार घाटी, राष्ट्रीय स्मारक गढ़धनोरा, कोपेन कोन्हाड़ी में चौथी शताब्दी की प्राचीन गणेश मूर्ति इसकी प्रसिद्धि का कारण हैं। घाटी की समाप्ति पर उपर स्थित पंचवटी घाटी की मनोरम छंटा बिखेरता हैं।
40. ऋषभ तीर्थ गुंजी व शक्ति : बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का तमउदहरा झरना, पंचवटी एवं गिद्ध पर्वत प्रसिद्ध है।
41. पाली : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का 9 वीं शताब्दी का शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
42. लाफागढ़ : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। मेकाल पर्वत की उंची चोटी पर किला व जटाशंकरी नदी का उद्गम स्थल प्रसिद्ध है। यह कलचुरियों की प्रथम राजधानी रही है।
43. धनपुर : बिलासपुर जिले में स्थित धनपुर जैन तीर्थकर की मूर्ति एवं प्राचीन मन्दिर के लिये विख्यात है।
44. कोरबा : यहां पर भारत का सबसे बड़ा ताप विद्युत गृह एवं एल्युमीनियम का कारखाना स्थित है।
45. चांग-भखार : सरगुजा जिले में स्थित चांग-भखार कलचुरी व चौहानकालीन मठों व मन्दिर के पुरावशेषों के लिये प्रसिद्ध है।
46. बैलाडीला : बस्तर जिले में स्थित बैलाडीला की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं। यहां का लोहा जापान को निर्यात किया जाता है।
47. बिलाई माता : धमतरी नगर में स्थित बिलाई माता का मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। प्रत्येक नवरात्रि में यहां मेला लगता है ।
48. बिरकोनी : महासमुंद जिले में स्थित है। यहां का चण्डीमाता का मन्दिर प्रसिद्ध है।
49. चंडी-डोंगरी : बागबाहरा के पास स्थित चण्डी-डोंगरी चण्डीमाता की विशाल प्रतिमा के कारण प्रसिद्ध है।
50. ब्राह्मनी : यह महासमुंद जिले में स्थित है। यहां पर बह्नेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर व श्वेत गंगा नामक जल-कुण्ड प्रसिद्ध है।
स्रोत : विकिपीडिया

छत्तीसगढ़ के पर्व

1. राखी
2. होली : जातीय उत्साह की अभिव्यक्ति का एक और उम्दा माध्यम है देवारों के अपने तीज-त्यौहार। हिन्दुओं के त्यौहार ही प्रायः देवार मानते हैं। अलबत्ता कुछेक त्यौहार जरुर ऐसे होते हैं जो खास महत्व लिए रहते हैं। इन्हीं में फागुन की मस्ती में डूबा होली विशेष त्यौहार है। होली देवारों में काफी उमंग-हड़दंग के संग मनती है। इस दिन समूचा कुनबा महुये की मदमस्ती में मस्त हो जाता है। मांदर, ढोल मंजीरे के संग गीत भी गाये जाते है। होली पर किसी चिन्हित स्थान पर एकत्र होने का चलन है। इस रोज शुभ मुहुर्त देखकर बैगा अनुष्ठान करना है और उसकी अनुमति के उपरांत प्रतीकात्मक होली जलाई जाती है। वृद्ध-जवान, स्त्री-पुरुष और बच्चा मंडली भी मदिरा पीकर लोट-पोट होती है।
3. दशहरा
4. दिपावली
5. गणेशोत्सव
6. डोल ग्यारस
7. देव उठनी ग्यारस
8. दिवासा
9. पोरा : देवारों में पोरा काफी महत्व है। अलबला तीजा नहीं मानते। सामान्यतः बहन को भाई जिस तरह अपने घर लाते हैं उस परंपरा की बजाय बहन ससुराल में रहकर ही तीजा मानती है। वहीं व्रत उपवास आदि होता है। लेकिन वस्त्रादि उपहार स्वद्वप देने का कोई चलन नहीं है। पोरा में कुम्हारों से मिट्टी की कुछ वस्तुयें खरीदकर उसकी पूजा के बाद बलि दी जाती है। भादो के शुक्ल पक्ष में ठाकुर देव को भी ये लोग बड़ी आस्था से पूजते हैं और बलि के बाद प्रसाद बंटता है।
10. सकट : देवारों में सकट का अत्यधिक महत्वपूर्ण पर्व है। सकट में महिलायें अपने माता-पिता के घर आती है। उपवास रखा जाता है। सामूहिक भोज से उपवास तोड़ा जाता है। परिजन वस्त्र, श्रृंगार सामग्रियाँ अपनी कन्या को देते है।
11. हरेली : हरेली यद्यपि खेतिहर-समाज का पर्व है फिर भी इसके दूसरे स्वरुप यानी तंत्र मंत्र वाले हिस्से को देवारों का वर्ग मानता है। जिस तरह छत्तीसगढ़ के ग्राम्यांचलों में बुरी-बलाओं को बाहर ही रखने नीम की पत्तियों को लवय की तरह इस्तेमाल करते हैं। उसी तरह देवार भी नीम की डंगालों का सहारा लेते है। सुअर डेरा के बाहर नीम की पत्तियाँ खोंसी जाती हैं। अपने संगीतिक उपकरण को भी हरेली पर पूजते हैं। लेकिन व्यापक तौर पर हरेली का उत्सव नहीं मनता।
12. नृत्य-गान : देवारों की प्रामणिक पहचान उनका सांस्कृतिक ज्ञान हैं। जन-सामान्य में भी उनके इसी रुप की सर्वाधिक ख्याति हैं। इन्हें प्रतिष्ठा दिलवाने में गायन, वादन, एवं नृत्य पर इनका अचूक अधिकार माना गया हैं। इस जन्म-जात और असाधारण कला-ज्ञान के चलते हर हमेशा से देवार जीवंत बने हुए हैं। जीवन के प्रत्येक पल में गीत नृत्य की खनक दीवारों का जातीय गुण हैं। इनकी इसी जीविकोर्जन का एक ठोस माध्यम तो यह हैं ही, वाद्य, गायन एवं नर्तन इन तीन बिंदुओं के सहारे भी इनकी विशेषतायें समझी जा सकती हैं। सांगीतक भेद को आधार मानें तो रायपुरिहा और रतनपुरिहा देवारों की अलग-अलग पहचान हैं। जो इन्हें समझने में भी सहायक बनते हैं।
13. व्रत/समस्त वार
सोमवारमंगलवारबुधवारगुरुवारशुक्रवारशनिवाररविवार
14. संकटी चौथ
15. कर्वा चौथ
16. गणपति चौथ
17. ग्यारस
18. प्रदोष
19. अमावस
20. पूनम
21. बीज
22. गणगौर
23. शीतला सप्तमी
24. दसामाता
25. राम नवमी
26. आखा तीज
27. वड़सावित्री
28. असाड़ी पूजा
29. नाग पंचमी
30. श्रवण पूजन
31. काजली तीज
32. जन्माष्टमी
33. बस बारस
34. हरतालिका तीज
35. ऋषि पंचमी
36. गोगा नवमी
37. अनन्त चौदस
38. गाजबीज
39. गुड़ी पड़वा
40. गंगा दसमी
41. हल छट
42. संजा
43. नवरात्र
44. अमकारी आठम
45. उपछट
46. सुहाग पड़वा
47. गोरधन पूजा
48. भाई दूज
49. आँवला नवमी
50. मकर संक्रान्ति
51. बसंत पंचमी
52. मौन व्रत
53. सात्या टीली
54. पोषी रविवार
55. जया पार्वती व्रत
56. महाशिवरात्रि
57. धनलक्ष्मी का व्रत
58. गल
59. चूल
60. गौहरी
61. हिंगोट
62. बाड़ी
63. कंसवधोत्सव
64. विद्या के उत्सव

शुक्रवार, 29 मई 2009

छत्तीसगढ़ में नदियाँ

1. महानदी : यह छत्तीसगढ़ प्रदेश की जीवन रेखा है। महानदी रायपुर के सिहावा पर्वत से 42 मीटर की ऊंचाई से निकलकर दक्षिण-पूर्व की ओर से उड़ीसा के पास से बहते हुये बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। छत्तीसगढ़ राज्य में इसकी लम्बाई 286 किमी. है। महानदी की कुल लम्बाई 858 किमी. है। इस पर दुधावा, माढ़मसिल्ली, गंगरेल, सिकासेर, सोंढुर बांध बने हैं। उड़ीसा पर विशाल हीराकुण्ड बांध भी इसी नदी पर बना है।
2. शिवनाथ नदी : यह महानदी की सहायक नदी है। यह राजनांदगांव जिले की अंबागढ़ तहसील की 625 मीटर ऊंची पानाबरस पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर बलौदाबाजार तहसील के पास महानदी में मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियां लीलागर, मनियारी, आगर, हांप सुरही, खारुन तथा अरपा आदि हैं। इसकी कुल लम्बाई 280 किमी है।
3. हसदेव नदी इन्द्रावती नदी : यह महानदी की प्रमुख सहायक नदी है तथा कोरबा के कोयला क्षेत्र में तथा चांपा मैदान में प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदी है। यह नदी सरगुजा जिले की कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर कोरबा, बिलासपुर जिलों में बहती हुई महानदी में मिल जाती है। हसदो का अधिकांश प्रवाह क्षेत्र ऊबड़-खाबड़ है। इसकी कुल लंबाई 209 किमी. और प्रवाह क्षेत्र 7.210 किसी. है।
4. अरपा नदी : इसका उद्गम पेण्ड्रा पठार की पहाड़ी से हुआ है। यह महानदी की सहायक नदी है। यह बिलासपुर तहसील में प्रवाहित होती है और बरतोरी के निकट ठाकुर देवा नामक स्थान पर शिवनाथ नदी में मिल जाती है। इसकी लम्बाई 147 किमी. है।
5. रेणुका नदी : यह सरगुजा जिले में बहती है।
6. खारुन नदी : यह महानदी की सहायक नदी है। यह दुर्ग जिले की बालोद तहसील के सजारी क्षेत्र से निकलकर शिवनाथ नदी में मिलती है। इस नदी की लम्बाई 208 कि.मी. है तथा प्रवाह क्षेत्र 22,680 वर्ग किमी. है।
7. मनियारी नदी : यह नदी बिलासपुर के उत्तर-पश्चिम में लोरमी पठार से निकलती है। इसका उद्गम स्थल मुखण्डा पहाड़ बेलपान के कुण्ड तथा लोरमी का पहाड़ी क्षेत्र है। यह दक्षिणी-पूर्वी भाग में बिलासपुर तथा मुंगेली तहसील की सीमा बनाती हुई प्रवाहित होती है। आगर, छोटी नर्मदा तथा घोंघा इसकी सहायक नदियां हैं। इस नदी पर खारंग मनियारी जलाशय का निर्माण किया गया है, जिससे मुंगेली तहसील के 42.510 हेक्टेअर क्षेत्र में सिंचाई की जाती है। इस नदी की कुल लंबाई 134 किमी. है।
8. लीलागर : इस नदी का उद्गम कोरबा की पूर्वी पहाड़ी से हुआ है। यह कोरबा क्षेत्र से निकलकर दक्षिण में बिलासपुर और जांजगीर तहसील की सीमा बनाती हुई शिवनाथ नदी में मिल जाती है। इस नदी की कुल लंबाई 135 किमी. और प्रवाह क्षेत्र 2.333 वर्ग किमी. है।
9. इन्द्रावती नदी : इन्द्रावती गोदावरी की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह बस्तर की जीवनदायिनी नदी है। यह इस संभाग की सबसे बड़ी नदी है। इसका उद्गम उड़ीसा राज्य में कालाहाण्डी जिले के युआमल नामक स्थान में डोगरला पहाड़ी से हुआ है। यह आंध्रप्रदेश में जाकर गोदावरी नदी में मिल जाती है। जगदलपुर शहर इसी नदी के तट पर बसा हुआ है। इस नदी का प्रवाह क्षेत्र 26.620 वर्ग किमी. है और लम्बाई 372 किमी. है।
10. कोटरी नदी : यह इन्द्रावती की सबसे बड़ी सहायक नदी है। इसका उद्गम दुर्ग जिले से हुआ है। इसका अप्रवाह क्षेत्र दक्षिण-पश्चम सीमा पर राजनांदगांव की उच्च भूमि पर है। डंकिनी और शंखिनी नदी - ये दोनों इन्द्रावती की सहायक नदियां है। डंकिनी नदी किलेपाल एवं पाकनार की डांगरी-डोंगरी से तथा शंखिनी नदी बैलाडीला की पहाड़ी के 4,000 फीट ऊंचे नंदीराज शिखर से निकलती है। इन दोनों नदियों का संगम दन्तेवाड़ा में होता है।
11. बाघ नदी : यह नदी चित्रकूट प्रपात के निकट इन्द्रावती नदी से मिलती है।
12. गुडरा नदी : यह नदी छोटे-डोंगर की चट्टानों के बीच अबूझमाड़ की बनों से घिरी हुई पहाड़ियों से प्रवाहित होती है।
13. मारी नदी : यह नदी दक्षिण-पश्चिम दिशा में भैरमगढ़ से निकलकर बीजापुर की ओर प्रवाहित होती है। इसे मोरल नदी भी कहते हैं।
14. सबरी नदी : यह दन्तेवाड़ा के निकट बैलाडीला पहाड़ी से निकलती है और कुनावरम् (आन्ध्रप्रदेश) के निकट गोदावरी नदी में मिल जाती है। बस्तर जिले में इसका प्रवाह क्षेत्र 180 किमी. है।
15. तांदुला नदी : यह नदी कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर के उत्तर में स्थित पहाड़ियों से निकलती है यह शिवनाथ की प्रमुख सहायक नदी है। इसकी लम्बाई 64 किमी. है। तांदुला बांध इसी नदी पर बालोद तथा आदमाबाद के निकट बनाया गया है। इससे पूर्वी भाग में नहरों से सिंचाई होती है।
16. पैरी नदी : यह महानदी की सहायक नदी है। गरियाबंद तहसील के अत्ररीगढ़ पहाड़ी से निकलकर महानदी में राजिम में आकर मिलती है। इसकी लम्बाई 90 किमी. है तथा प्रवाह क्षेत्र 3,000 वर्ग मीटर है।
17. जोक नदी : यह नदी रायपुर के पूर्वी क्षेत्र का जल लेकर शिवरीनारायण के ठीक विपरीत दक्षिणी तट पर महानदी में मिलती है इसकी रायपुर जिले में लम्बाई 90 किमी. है तथा इसका प्रवाह क्षेत्र 2,480 वर्ग मीटर है।
18. माँड नदी : सरगुजा जिले के मैनपाट से निकलकर यह रायगढ़, सरगुजा, बस्तर जांजगीर जिलों में बहती हुई चन्द्रपुर के निकट महानदी में मिल जाती है। रायगढ़ जिले में इसकी लम्बाई 174 किमी. तथा अपवाह क्षेत्र 4.033 वर्ग किमी. है।
स्रोत: www.cgculture.in

बुधवार, 20 मई 2009

छत्तीसगढ़ के छत्तीस गढ़

रतनपुर के गढ़ गाँव
रतनपुर 360
मारो 354
बिजयपुर 326
खरोद 145
कोटागढ़ 84
नवागढ़ 84
सोंथी 84
ओखर अज्ञात
मुंगेली सहित पँडरभट्ठा 324
सेमरिया 84
चाँपा 153
बाफा 200
छुरी 220
केण्डा 84
मातिन 84
उपरौरा 84
पेण्ड्रा 84
कुरकुट्टी 700
रायपुर के गढ़ गाँव
रायपुर 640
पाटन 152
सिमगा 84
सिंगारपुर अज्ञात
लवन 252
अमेरा 84
दुर्ग 84
सारडा अज्ञात
सिरसा 84
मोहदी 84
खल्लारी 84
सिरपुर 84
फिंगेश्वर 84
राजिम 84
सिंगनगढ़ 84
सुअरमाल 84
टेंगनागढ़ 84
अकल वारा 84

छत्तीसगढ़ का परिचय

देश के नक्शे पर उभरा छब्बीसवाँ राज्य छत्तीसगढ़ पुराने मध्यप्रदेश से काटकर बनाया गया नया राज्य। वैसे शताब्दियों से छत्तीसगढ का अस्तित्व एक अलग इकाई के रुप में रहा है। पहले इसे दक्षिण कोसल कहा जाता था। मिथक कथाओं के अनुसार इस राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के नाम पर इस इलाक़े का नाम कोसल पड़ा था। कथा यह भी है कि राम अपने वनवास के दौरान छत्तीसगढ़ से ही गुज़रे थे और शबरी ने राम को बेर यहीं खिलाए थे। एक कथा महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। इसके आधार पर कुछ इतिहासकार मानते हैं कि बिलासपुर के पांडो, कोरवा और कंवर जनजातियों को पांडव और कौरवों से जोड़कर देखते हैं। इन कथाओं का कोई प्रमाण तो नहीं लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मानव प्रजाति के विकास के लिए छत्तीसगढ़ उपयुक्त जगह थी और पाषाण युग के अवशेष बताते हैं कि यहाँ मानव सभ्यता का विकास हो रहा था। रायगढ़ के कबरा पहाड़ और सिंघनपुर की गुफ़ाओं में मिले भित्तिचित्र भी काफ़ी कुछ कहते हैं।
कलचुरि राजवंश और नामाकरण : छत्तीसगढ की एक इकाई के रुप में पहचान का सबसे प्रामाणिक इतिहास कलचुरि राजाओं का शासन काल है। 1000 ई. में पहला कलचुरि राजा कलिंगराज कोसल पहुँचा था। उसके बेटे रत्नदेव ने अपने राज्य की राजधानी रत्नपुर में बनाई जिसे आज रतनपुर के नाम से जाना जाता है। बाद में इसी राजवंश की एक शाखा की राजधानी रायपुर में भी स्थापित हुई। इतिहास बताता है कि कलचुरि राजा कुशल प्रशासक थे और शासन के विकेंद्रीकरण के हामी थे। कलचुरि राजाओं ने कुछ प्रशासनिक इकाइयाँ बनाईं। सबसे छोटी इकाई थी बरहा। बारह गाँव का बरहा और सात बरहों का एक गढ़ यानी 84 गाँवों का एक गढ़। हालांकि यह लचीली व्यवस्था थी और गाँवों की संख्या भौगोलिक ज़रुरतों के अनुसार कम-ज़्यादा होती रहती थी लेकिन गढ़ यहीं से शुरु हुए। कलचुरि शासन दो हिस्सों में बँटा था। एक शिवनाथ के उत्तर में और दूसरा शिवनाथ के दक्षिण में दोनों ओर 18-18 प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। दोनों ओर 18 गढ़ इस तरह कलचुरियों के 36 गढ़ थे और यही नामकरण का आधार बना। लेकिन इस छत्तीसगढ़ में बस्तर शामिल नहीं था वह बाद में मुगलों और मराठों के शासन काल में शामिल हुआ। मराठों ने छत्तीसगढ को एक अलग प्रशासनिक इकाई माना लेकिन वे शासन नागपुर से करते रहे. अंग्रेज़ आए तो उन्होंने भी छत्तीसगढ़ का शासन बहुत समय तक नागपुर से ही संभाला। मराठों से पूरी तरह सत्ता हथियाने के बाद उन्होंने राजधानी को रायपुर स्थानांतरित किया।
विद्रोह और आंदोलन :1857 में विद्रोह की लहर छत्तीसगढ़ तक भी आई और यहाँ भी सेना ने बगावत किया। लेकिन इसका परिमाण बड़ा नहीं था और दूसरी जगहों की तरह यहाँ भी इसे कुचल दिया गया। लेकिन इस विद्रोह के बाद प्रशासनिक संगठन का काम शुरु हुआ और 1860 में मध्य प्रांत का गठन हुआ। नागपुर, महाकोसल और छत्तीसगढ़ को मिलाकर वे सीपी एंड बरार कहते थे। इसमें छोटी-छोटी 14 रियासतें थीं।
आज़ादी के बाद : 1947 के बाद इस इलाक़े को चार हिस्सों में बाँट दिया गया। मध्यभारत, महाकोसल, विंध्य प्रदेश और भोपाल। इस व्यवस्था में छत्तीसगढ़ महाकोसल का हिस्सा था। 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसार भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ। भाषाओं के आधार पर राज्य बनाने के बाद बीच का बचा हुआ हिस्सा, जो भाषा के आधार पर अपनी कोई अलग पहचान नहीं रखता था मध्यप्रदेश कहलाया और छत्तीसगढ़ इसी मध्यप्रदेश का हिस्सा बन गया। वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य का सवाल पुनर्गठन आयोग के सामने आया था लेकिन वो बड़े राज्यों का ज़माना था इसलिए उस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। छत्तीसगढ़ की अलग पहचान को लेकर सवाल यदाकदा उठते रहे लेकिन खूबचंद बघेल ने इसे सुगठित रुप देने की कोशिश की। 1956 से लेकर 1969 तक उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोगों को संगठित करने की कई कोशिशें कीं। बाद में पवन दीवान ने इस कोशिश को आगे बढ़ाया लेकिन वे भी कोई दमदार आंदोलन खड़ा न कर सके। छत्तीसगढ़ का सबसे सुगठित आंदोलन 1977 से 1990 के बीच शंकर गुहा नियोगी ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बनाकर चलाया लेकिन इसका सीधा ताल्लुक़ छत्तीसगढ़ राज्य की अलग पहचान से कुछ कम था मज़दूर आंदोलनों से अधिक था। लेकिन यह स्पष्ट था कि छत्तीसगढ़ को लेकर एक महत्वाकांक्षा इस आंदोलन में जाग चुकी थी और इस मोर्चा को एक राजनीतिक इकाई में तब्दील कर दिया गया था। लेकिन नियोगी की हत्या से एक मज़बूत आंदोलन एकाएक बिखर गया।
राज्य निर्माण : 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में एक अशासकीय संकल्प पारित करके छत्तीसगढ़ राज्य की मांग की गई। इसके बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने इस मांग को अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस मांग को शामिल करना शुरु कर दिया। 1998 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने चुनाव प्रचार करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का वादा किया और फिर उनकी सरकार बन गई तो यह मुद्दा एकाएक गरमा गया। राज्य बनाने का चुनावी नारा एक हकीकत में बदलने लगा। एक बार भाजपा की सरकार गिर गई फिर नए चुनाव हुए लेकिन नए राज्य का वादा बना रहा। उत्तरांचल और झारखंड के लोगों ने अपने लिए राज्य मांगने के लिए जो गंभीर आंदोलन किए थे उसकी तुलना में छत्तीसगढ़ में राज्य को लेकर कोई जनचेतना नहीं थी। लेकिन उन दोनों राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के लिए विधेयक बन गया। मध्यप्रदेश राज्य पुर्निर्माण विधेयक 2000 को 25 जुलाई 2000 में लोकसभा में पेश किया गया। इसी दिन बाक़ी दोनों राज्यों के विधेयक भी पेश हुए। 31 जुलाई को छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण का विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। 9 अगस्त को राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया और 25 अगस्त को राष्ट्रपति ने इसे मंज़ूरी दे दी। पहली नवंबर 2000 से देश के नक्शे पर छत्तीसगढ़ नाम का एक नया राज्य बन गया। जनता और जननेताओं की उम्मीद से पहले ही छत्तीसगढ़ राज्य बन गया।
स्रोत: विकिपीडिया

मंगलवार, 19 मई 2009

छत्तीसगढ़ के धार्मिक स्थल

अम्बिकापुर : यहां महामाया मंदिर है, जो कि देवी दुर्गा को समर्पित है। मान्यताओं के अनुसार यह इक्यावन शक्तिपीठ।शक्तिपीठों में से एक है।
राजिम : छत्तीसगढ़ का प्रयाग राजिम रायपुर से 47 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह महानदी के तट पर स्थित है। यहॉ पैरी और सोंढू नदियॉ महानदी में आकर मिलती हैं। माघ पूर्णिमा पर यहॉ प्रतिवर्ष मेला लगता है। जहॉ बड़ी संख्या में धर्मालु पवित्र महानदी में स्नान का पुण्य कमाते हैं। यहॉ भगवान राजीव लोचन का बेहद सुन्दर, प्राचीन मन्दिर है। इसके साथ ही मंदिरों के समूह भी हैं। जिनका विशेष धार्मिक महत्व है।
राजीव लोचन मन्दिर के अतिरिक्त यहॉ कुलेश्वर महादेव, राजेश्वर मंदिर, जगन्नाथ मन्दिर, पंचेश्वर महादेव मन्दिर, भूलेश्वर महादेव मन्दिर, नरसिंह मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, वामन वराह मन्दिर, राजिम तेलीन का मन्दिर, दानेश्वर मन्दिर, रामचन्द्र मन्दिर, सोमेश्वर महादेव मन्दिर, शीतला मन्दिर प्रमुख दर्शनीय हैं, जो अपनी वास्तुकला का परिचय देते है।
प्राचीन कथानुसार राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र या पद्मपुर था, जो इसका संबंध राजीव तेलीन, राजीव लोचन तथा जगपाल से जोड़ता है। कथानुसार राजीव तेलीन के पास काले पत्थर की मूर्ति थी। जगपाल ने राजीव तेलीन को सोना देकर मूर्ति प्राप्त कर राजीव लोचन नामक मन्दिर बनवाया। राजीव लोचन मन्दिर जगन्नाथपुरी जाने वाले तीर्थयात्रियों के रास्ते में आने वाले महत्वपूर्ण मन्दिरों में से एक है।
राजिम के लिये नियमित बस सेवा, रेल्वे लाइन (रायपुर-धमतरी छोटी रेल्वे लाइन) एवं टैक्सयाँ भी रायपुर व अभनपुर से उपलब्ध हैं। राजिम के पास महानदी पर लंबा पुल बन जाने पर बारहमासी सड़क संपर्क स्थापित हो गया है।
अन्य स्थल
चंपारण्य : रायपुर से 60 किलोमीटर दूर चम्पारण्य वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी की जन्म-स्थली होने के कारण यह उनके अनुयायियों का प्रमुख दर्शन स्थल है। यहॉ चम्पकेश्वर महादेव का पुराना मन्दिर है। इस मन्दिर के शिवलिंग के मध्य रेखाएँ हैं। जिससे शिवलिंग तीन भागों में बँट गया है, जो क्रमशः गणेश, पार्वती व स्वयं शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
डोंगरगढ़ : डोंगरगढ़ हावड़ा-मुंबई रेल्वे मार्ग पर स्थित राजनांदगॉव से 59किमी. दूर है। यहॉ पहाड़ी के ऊपर मॉ बम्लेश्वरी का विशाल मन्दिर है। नवरात्रि में यहॉ अपार जन-समूह माता जी के दर्शन के लिये आते हैं। इस मन्दिर का निर्माण राजा कामसेन ने करवाया था।
दन्तेवाड़ा : बस्तर की आराध्या देवी मॉ दंतेश्वरी की पावन नगरी दंतेवाड़ा है। यह डंकिनी-शंखिनी नदी के संगम पर स्थित है। यह जगदलपुर से 85 किमी. की दूरी पर स्थित है। इसका निर्माण रानी भाग्येश्वरी देवी द्वारा कराया गया था। पुरातात्विक महत्व के इस मन्दिर में मॉ दन्तेश्वरी के दर्शन के लिये भक्तों को सात दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है। माता के दर्शनार्थी युवकों को धोती पहनना अनिवार्य होता है। धोती की व्यवस्था मन्दिर में ही रहती है।
दन्तेवाड़ा में भैरव बाबा का एक प्रमुख मन्दिरशंखिनी नदी के दूसरे तट पर स्थित है । संगम स्थल पर एक विशाल शिलाखण्ड में एक पद चिह्न माना जाता है ।दंतेश्वरी मन्दिर के पास ही आदिवासी समाज के प्रमुख देव भीमा देव जो कि अकाल और बाढ़ से बचाने वाले माने गये हैं । उनकी विशेष प्रतिमा स्थित है ।
बारसूर : बस्तर की ऐतिहासिक नगरी बारसूर को नागवंशीय राजाओं की राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। यह जगदलपुर दन्तेवाड़ा मार्ग में गीदम से 23किमी. दूर है। यहॉ 11वीं, 12वीं शताब्दी के बत्तीसगा मन्दिर, देवरली मन्दिर, चन्द्रादित्य मन्दिर, मामा-भांजा मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। बारसूर की विशाल गणेश भगवान की प्रतिमा प्रसिद्ध है। नारायण गुड़ी मन्दिर का गरुड़ स्तम्भ व पेद्दम्मा गुड़ी की दुर्गा मूर्ति दन्तेवाड़ा के दंतेश्वरी मन्दिर में सुरक्षित है।
तुलार : अबूझमाड़ के माड़ क्षेत्र में दो पहाड़ियों के मध्य स्थित शिवलिंग पर सारे समय स्वच्छ, निर्मल जल टपकता रहता है। यहां का प्रसिद्ध शिलिंग तुलार के नाम से जाना जाता है। यह प्रसिद्ध बारसूर नगरी से 42किमी. दूर स्थित है।
गुप्तेश्वर : दक्षिण बस्तर में शबरी नदी के किनारे स्थित इस स्थान पर पुरातात्विक उत्खनन के उपरान्त 5वीं, 6वीं शताब्दी के कल्चुरी शासनकाल की मूर्तियां, मन्दिर व बावड़ी आदि मिली हैं। टीलों की खुदाई के उपरान्त शिव मन्दिरों का विशाल समूह निकला है।
ढोंढरेपाल : दरभा विकासखण्ड में स्थित यह प्राचीन भारतीय मन्दिर कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। त्रिरथ शैली में निर्मित तीन मन्दिरों के समूह के आज मात्र अवशेष रह गये हैं, मगर खण्डहर का हर पत्थर अतीत की सुन्दरता का गुणगान करता परिलक्षित होता है।
आरंग : रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर रायपुर से 36 किमी. दूरी पर स्थित आरंग एक प्राचीन नगरी है। सजिसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। बाद्य देवल मन्दिर एवं महामाया मन्दिर यहां के पौराणिक मन्दिरों में से एक हैं।
रतनपुर : आराध्य मां महामाया शक्तिपीठ की सीपना यहां कल्चुरी नरेश रत्नसेन ने की थी। यहां अनेकों सुन्दर पुराने मन्दिर, जलाशय तथा प्राचीन किले के अवशेष हैं।
खल्लारी : महासमुन्द जिले से लगभग 22 किमी. दूर स्थित है। यहां पास की एक पहाड़ी पर एक शिलाखण्ड है, जो सती स्तम्भ का एक भाग प्रतीत होता है। यह सिन्दूर से पुता हुआ है और खल्लारी माता के रुप में पूजनीय है। चैत्र माह में पूर्णिमा को खल्लारी ग्राम में देवी के सम्मान में एक मेला लगता है।
सिरपुर : राष्ट्रीय राजमार्ग 6 पर आरंग से 24 किमी. आगे बांयी ओर लगभग 16 किमी. पर सिरपुर स्थित है। प्राचीन काल में इसे श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। 5 वी, से 8 वीं सदी के मध्य यह दक्षिण कोशल की राजधानी था। 7 वीं सदी में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। लगभग 1000 वर्ष पुराना पूर्णतः ईटों से निर्मित यहां का लक्ष्मण मन्दिर, गंधेश्वर महादेव मन्दिर तथा बौद्ध विहार पर्यटकों को विशेष रुप से आकर्षित करता है।
शिवरीनारायण : महानदी और जोंक नदी के संगम पर बसा, जांजगीर जिले में स्थित शिवरीनारायण बिलासपुर से 63 किमी. पर स्थित है। यहां प्रसिद्ध विष्णु मन्दिर है। यह शिवरीनारायण से 3 किमी. दूरी पर स्थित है। खरोद में प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर मन्दिर है।
जगदलपुर : चौहानों का प्रसिद्ध नगर जगदलपुर संभागीय व जिला मुख्यालय है। पुरात्व के दृष्टिकोण से जगदलपुर का इतिहास काफी समृद्ध है। वहीं जगदलपुर का प्रसिद्ध राजमहल और उसमें स्थित माई दंतेश्वरी देवी का मन्दिर जगदलपुर का सबसे पवित्र स्थल है। आदिवासी संस्कृति की राजधानी जगदलपुर अपने सांस्कृतिक आयामों के कारण और भी ख्यातिलब्ध है। जगदलपुर का बस्तर दशहरा अपनी विशेष प्राचीन आदिवासी परम्परा का निर्वहन करने के कारण विश्व स्तरीय आदिम उत्सव में स्थान रखता है। इस प्रकार इस प्राचीन नगरी का महत्वपूर्ण स्थान है।
नारायणपाल का विष्णु मंदिर : इन्द्रावती और नारंगी के संगम के आस-पास अवस्थित नारायणपाल ग्राम जो कि जगदलपुर जिले से लगभग 23 मील दूर है। नागवंशीय वास्तुकला में पल्लवित यह भव्य मन्दिर भगवान विष्णु का है। इसका निर्माण नरेश जगदेक् भूषण की पत्नी ने सन् 1111 में नारायणपाल नामक स्थान में करवाया था। मन्दिर अपने आदर्श बनावट के लिये सुविख्यात है।
जांजगीर : बिलासपुर जिले में यह स्थित है। यहां पर भगवान विष्णु का अपूर्ण मन्दिर स्थित है। धमधा (दुर्ग)- यहां पर प्राचीन किला एवं मन्दिर पाया गया है।
नागपुरा - दुर्ग जिले में स्थित नागपुरा जैनियों का धार्मिक स्थल है। यहां पर श्री उवसंम्हार पार्श्वतीर्थ का प्राचीन जैन मन्दिर स्थित है।
बालोद : यह भी दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का सती का चबूतरा एवं प्राचीन किला प्रसिद्ध है। इसी के पास में झलमला स्थित है। जहां पर गंगा मैया का प्रसिद्ध मन्दिर है। हर 6 महीने में यहां पर नवरात्रि में मेला भरता है।
खरखरा : यह दुर्ग जिले में स्थित है। यहां का 1128 मीटर लम्बा मिट्टी का बना बांध प्रसिद्ध है।
देव-बालौदा : यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
सिंघोड़ा : यह सरायपाली, महासमुंद जिले में स्थित है। यहां सिंघोड़ा देवी का प्रसिद्ध मंदिर स्थित है।
तुरतुरिया : यह महासमुंद जिले में है। यहां बहरिया ग्राम के पास बाल्मीकी आश्रम स्थित है। यहां का काली मन्दिर भी प्रसिद्ध है।
पलारी : यह बलौदा बाजार के पास स्थित है। यहां का ईंटों से बना सिद्धेश्व मन्दिर प्रसिद्ध है।
गिरोधपुरी : यह संत घासीदास की जन्म-स्थली है।
दामाखेड़ा : यह सिमगा, रायपुर के पास स्थित है। यहां कबीरपंथियों की पीठ स्थित है।
सिहावा : यह नगरी से 8 किमी. दूर स्थित है। श्रृंगी ऋषि पर्वत से छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी का उद्गम हुआ है। यहां के अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में कर्णेश्वर महादेव, मातागुड़ी, मोखला मांझी एवं भिम्बा महाराज है।
चंदखुरी : यह रायपुर के पास स्थित है। यहां का प्राचीन शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
रविशंकर जलाशय : यह धमतरी से 13 किमी. दूर स्थित महानदी पर बना विशालकाय बांध है। इसे गंगरेल के नाम से भी जानते हैं। यह एक पिकनिक स्थल के पुर में भी विकसित हो चुका है।
केशकाल घाटी : यह बस्तर जिले में स्थित है। 5 किमी. लम्बी सर्पाकार घाटी, राष्ट्रीय स्मारक गढ़धनोरा, कोपेन कोन्हाड़ी में चौथी शताब्दी की प्राचीन गणेश मूर्ति इसकी प्रसिद्धि का कारण हैं। घाटी की समाप्ति पर उपर स्थित पंचवटी घाटी की मनोरम छंटा बिखेरता हैं।
ऋषभ तीर्थ गुंजी व शक्ति : बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का तमउदहरा झरना, पंचवटी एवं गिद्ध पर्वत प्रसिद्ध है।
पाली : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। यहां का 9 वीं शताब्दी का शिव मन्दिर प्रसिद्ध है।
लाफागढ़ : यह बिलासपुर जिले में स्थित है। मेकाल पर्वत की उंची चोटी पर किला व जटाशंकरी नदी का उद्गम स्थल प्रसिद्ध है। यह कलचुरियों की प्रथम राजधानी रही है।
धनपुर : बिलासपुर जिले में स्थित धनपुर जैन तीर्थकर की मूर्ति एवं प्राचीन मन्दिर के लिये विख्यात है।
बिलाई माता : धमतरी नगर में स्थित बिलाई माता का मन्दिर प्रसिद्ध मन्दिर है। प्रत्येक नवरात्रि में यहां मेला लगता है।
बिरकोनी : महासमुंद जिले में स्थित है। यहां का चण्डीमाता का मन्दिर प्रसिद्ध है।
चंडी-डोंगरी : बागबाहरा के पास स्थित चण्डी-डोंगरी चण्डीमाता की विशाल प्रतिमा के कारण प्रसिद्ध है।
ब्राह्मनी : यह महासमुंद जिले में स्थित है। यहां पर बह्नेश्वर महादेव का प्राचीन मन्दिर व श्वेत गंगा नामक जल-कुण्ड प्रसिद्ध है।
स्रोत : www.cgculture.in

छत्तीसगढ़ में वन सम्पदा

1862 ई.में ब्रिटिश सरकार ने वनों के प्रबंध के लिये वन-विभाग की स्थापना की थी, किन्तु रियासतों के नरेशों ने वन की सुरक्षा तथा प्रबंध की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अतः आजादी के पश्चात् छत्तीसगढ़ के वन, वन-विभाग के अन्तर्गत आ गये। छत्तीसगढ़ राज्य का 59285.27 हेक्टेअर भू-भाग वनों से आच्छादित है, जो प्रदेश के कुल भू-क्षेत्रफल का 43.85 प्रतिशत है। बघेलखण्ड पठार का लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति से ढका है। कोरिया के बलुआ पत्थरों के क्षेत्र में साल के वनों का आधिक्य है। यहाँ साल के वन सर्वत्र मिलते हैं। जशपुर-सामरी पाट प्रदेश में उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन पाये जाते हैं। यहाँ पर चौड़ी पत्ती वाले वन पाये जाते हैं, जिनके वृभ ग्रीष्म ऋतु में पत्तियाँ गिरा देते हैं। जशपुर-सामरी पाट प्रदेश के दक्षिणी दो-तिहाई भाग में उष्ण-कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन मिलते हैं। यहां साल के वन अधिकांश जशपुर तहसील में पाये जाते हैं। सामरी तहसील में अधिकतर मिश्रित वन पाये जाते हैं। सामरी तहसील में शुष्क साल वन भी मिलते हैं। यहाँ साल के अतिरिक्त बीजा, जामुन, महुआ तथा सेंजा भी पाये जाते हैं।
दंडकारण्य प्रदेश में पायी जाने वाली वनस्पति उष्ण-कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन हैं। जिनमें साल के वृक्षों की प्रधानता है। साल के अतिरिक्त सागौन वृक्ष पाये जाते हैं। सामरी तहसील में शुष्क साल वन भी मिलते हैं। यहां साल के अतिरिक्त बीजा, जामुन, महुआ तथा सेंजा के वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं-कहीं बाँस के वन भी पाये जाते हैं।महानदी बेसिन के छत्तीसगढ़ बेसिन में वनों का क्षेत्र नगण्य है, जबकि उच्चभूमि वाली तहसीलों में आधी से अधिक भूमि वनों से आच्छादित है। यहाँ पाये जाने वाले वनों में साल, सागौन तथा मिश्रित वन मिलते हैं। बेसिन के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र को छोड़कर सभी भागों में साल के वन पाये जाते हैं या फिर मिश्रित वन मिलते हैं। सागौन के वन दक्षिणी तथा पश्चिमी भागों में पाये जाते हैं। साल तथा सागौन के अतिरिक्त अन्य प्रकार के वृक्ष मिलते है।
वनों से साल, सागौन, बाँस आदि प्रमुख संपत्ति प्राप्त होती है, जबकि गौण संपत्ति में लाख, तेंदू पत्ता, कत्था, हर्रा, विभिन्न प्रकार के गोंद, दवाओं के लिये पौधे तथा विभिन्न प्रकार की घासें हैं। खैर के वृक्ष सरगुजा में बहुतायत से मिलते हैं। लाख के कारखाने धमतरी, रायगढ़, मनेन्द्रगढ़, पेन्ड्रा चाँपा तथा सक्ती आदि में हैं। तेंदूपत्ता बिलासपुर, रायपुर, सरगुजा, बस्तर, काँकेर आदि में उत्तम किस्म का पाया जाता है। बाँस का प्रयोग पेपर मिलों में किया जाता है। वन छत्तीसगढ़ के लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार के रोजगार उपलब्ध कराने का भी प्रमुख स्त्रोत है, साथ ही यहाँ के जंगल जलाऊ लकड़ी का भी प्रमुख साधन हैं। यहाँ के वनों में प्रमुखतः नीम्न वृक्षों को प्रजातियाँ पायी जाती हैं। जिनके मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं-
साल : बस्तर अपने साल वनों के लिये प्रसिद्ध है। साल की लकड़ी मुख्यतः इमारतों के निर्माण में एवं रेल्वे स्लीपर बनाने के उपयोग में आती है।
सागौन : सागौन की लकड़ी भी इमारती लकड़ी है। जिसकी माँग सम्पूर्ण भारत में है। ये घरों तथा लकड़ी का सामान बनाने के उपयोग में आती है।
तेंदूपत्ता : बीड़ी उद्योग का आधार तेंदूपत्ता छत्तीसगढ़ की प्रमुख उपज है। इस प्रकार वनोपज की प्रधानता के कारण छत्तीसगढ़ के वनोपज पर आधारित लगभग 10,000 औद्योगिक इकाईयाँ हैं। इनमें 306 पंजीकृत कारखाने हैं।
बाँस : छत्तीसगढ़ के वन बाँस उत्पादन के लिये विख्यात हैं । बाँस का उपयोग घर बनाने के लिये किया जाता है। तकनीकी ज्ञान के द्वारा यह संभव हो सका है कि बाँस की लुगदी से कागज बनाया जाता है। अमलाई और नेपानगर के कागज कारखानों में बाँस का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की कमार जनजाति के लोग बाँस के वनों पर आश्रित हैं। वे बाँस के बर्तन, टोकरी, सजावटी बस्तुयें आदि बनाकर अपना जीवन-यापन करते हैं।
अन्य वनोपज : लघु वनोपजों में लाख, महुआ, फूल, आंवला, हर्रा, गोंद, कत्था, कोसा, इमली आदि हैं। इन लघु वनोपज से संकलित उद्योगों में आटा मिल, बैंलगाड़ी के चक्के, फर्नीचर, बीड़ी, हर्रा तथा कत्था उद्योग शामिल है।छत्तीसगढ़ की मुख्य उपजों में से बाँस, सागौन, साल, तेन्दुपत्ता लाख प्रमुख हैं । इसके अलावा साजा, धीरा, कर्रा, सरई, बीजा, अर्जुन, महुआ, बबूल, आंवला, शीशम, तेन्दु, खैर, हल्दू, कुसुम, चार, कहवा आदि के वृक्ष भी यहाँ मिलते हैं।अन्य गौण उपजें साल बीज, फलों में बेल, आंवला, हर्रा, कोसम बहेड़ा, आम, जामुन, सीताफल, बेर, भिलावा सिंघाड़ा, तेन्दु महुआ, कत्था, गौंद, शहद एवं मोम, रेशम आदि हैं।
स्रोत: www.cgculture.in

छत्तीसगढ़ एक नजर

छत्तीसगढ़ भारत का एक राज्य है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन १ नवंबर २००० को हुआ था। यह भारत का २६वा राज्य है। भारत में दो क्षेत्र ऐसे हैं जिनका नाम विशेष कारणों से बदल गया - एक तो 'मगध' जो बौद्ध विहारों की अधिकता के कारण "बिहार" बन गया और दूसरा 'दक्षिण कौशल' जो छत्तीस गढ़ों को अपने में समाहित रखने के कारण "छत्तीसगढ़" बन गया। किन्तु ये दोनों ही क्षेत्र अत्यन्त प्राचीन काल से ही भारत को गौरवान्वित करते रहे हैं। "छत्तीसगढ़" तो वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों के विकास का केन्द्र रहा है। यहाँ के प्राचीन मन्दिर तथा उनके भग्नावशेष इंगित करते हैं कि यहाँ पर वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध के साथ ही अनेकों आर्य तथा अनार्य संस्कृतियों का विभिन्न कालों में प्रभाव रहा है।
छत्तीसगढ़ का भूगोल : छत्तीसगढ़ के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में मध्यप्रदेश का रीवां संभाग, उत्तर-पूर्व में उड़ीसा और बिहार, दक्षिण में आंध्र प्रदेश और पश्चिम में महाराष्ट्र राज्य स्थित हैं। यह प्रदेश ऊँची नीची पर्वत श्रेणियों से घिरा हुआ घने जंगलों वाला राज्य है। यहाँ साल, सागौन, साजा और बीजा और बाँस के वृक्षों की अधिकता है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र के बीच में महानदी और उसकी सहायक नदियाँ एक विशाल और उपजाऊ मैदान का निर्माण करती हैं, जो लगभग 80 कि.मी. चौड़ा और 322 कि.मी. लम्बा है। समुद्र सतह से यह मैदान करीब 300 मीटर ऊँचा है। इस मैदान के पश्चिम में महानदी तथा शिवनाथ का दोआब है। इस मैदानी क्षेत्र के भीतर हैं रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जिले के दक्षिणी भाग। धान की भरपूर पैदावार के कारण इसे धान का कटोरा भी कहा जाता है। मैदानी क्षेत्र के उत्तर में है मैकल पर्वत शृंखला। सरगुजा की उच्चतम भूमि ईशान कोण में है । पूर्व में उड़ीसा की छोटी-बड़ी पहाड़ियाँ हैं और आग्नेय में सिहावा के पर्वत शृंग है। दक्षिण में बस्तर भी गिरि-मालाओं से भरा हुआ है। छत्तीसगढ़ के तीन प्राकृतिक खण्ड हैं : उत्तर में सतपुड़ा, मध्य में महानदी और उसकी सहायक नदियों का मैदानी क्षेत्र और दक्षिण में बस्तर का पठार। राज्य की प्रमुख नदियाँ हैं - महानदी, शिवनाथ, खारुन, पैरी , तथा इंद्रावती नदी
छत्तीसगढ़ का इतिहास
रामायणकालीन छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल के दक्षिण कोशल का एक हिस्सा है और इसका इतिहास पौराणिक काल तक पीछे की ओर चला जाता है। पौराणिक काल का 'कोशल' प्रदेश, कालान्तर में 'उत्तर कोशल' और 'दक्षिण कोशल' नाम से दो भागों में विभक्त हो गया था इसी का 'दक्षिण कोशल' वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इस क्षेत्र के महानदी (जिसका नाम उस काल में 'चित्रोत्पला' था) का मत्स्य पुराण, महाभारत के भीष्म पर्व तथा ब्रह्म पुराण के भारतवर्ष वर्णन प्रकरण में उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण में भी छत्तीसगढ़ के बीहड़ वनों तथा महानदी का स्पष्ट विवरण है। स्थित सिहावा पर्वत के आश्रम में निवास करने वाले श्रृंगी ऋषि ने ही अयोध्या में राजा दशरथ के यहाँ पुत्र्येष्टि यज्ञ करवाया था जिससे कि तीनों भाइयों सहित भगवान श्री राम का पृथ्वी पर अवतार हुआ। राम के काल में यहाँ के वनों में ऋषि-मुनि-तपस्वी आश्रम बना कर निवास करते थे और अपने वनवास की अवधि में राम यहाँ आये थे।
इतिहास में इसके प्राचीनतम उल्लेख सन 639 ई० में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्मवेनसांग के यात्रा विवरण में मिलते हैं। उनकी यात्रा विवरण में लिखा है कि दक्षिण-कौसल की राजधानी सिरपुर थी। बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संस्थापक बोधिसत्व नागार्जुन का आश्रम सिरपुर (श्रीपुर) में ही था। इस समय छत्तीसगढ़ पर सातवाहन वंश की एक शाखा का शासन था। महाकवि कालिदास का जन्म भी छत्तीसगढ़ में हुआ माना जाता है। प्राचीन काल में दक्षिण-कौसल के नाम से प्रसिद्ध इस प्रदेश में मौर्यों, सातवाहनों, वकाटकों, गुप्तों, राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय वंशों, सोमवंशियों, नल वंशियों, कलचुरियों का शासन था। छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय राजवंशो का शासन भी कई जगहों पर मौजूद था। क्षेत्रिय राजवंशों में प्रमुख थे: बस्तर के नल और नाग वंश, कांकेर के सोमवंशी और कवर्धा के फणि-नाग वंशी। बिलासपुर जिले के पास स्थित कवर्धा रियासत में चौरा नाम का एक मंदिर है जिसे लोग मंडवा-महल भी कहा जाता है। इस मंदिर में सन् 1349 ई. का एक शिलालेख है जिसमें नाग वंश के राजाओं की वंशावली दी गयी है। नाग वंश के राजा रामचन्द्र ने यह लेख खुदवाया था। इस वंश के प्रथम राजा अहिराज कहे जाते हैं। भोरमदेव के क्षेत्र पर इस नागवंश का राजत्व 14 वीं सदी तक कायम रहा।
साहित्य
छत्तीसगढ के प्रमुख साहित्यकार: छत्तीसगढ़ साहित्यिक परम्परा के परिप्रेक्ष्य में अति समृद्ध प्रदेश है। इस जनपद का लेखन हिन्दी साहित्य के सुनहरे पृष्ठों को पुरातन समय से सजाता-संवारता रहा है। श्री प्यारेलाल गुप्त अपनी पुस्तक "प्राचीन छत्तीसगढ़" में बड़े ही रोचकता से लिखते है। छत्तीसगढ़ी और अवधी दोनों का जन्म अर्धमागधी के गर्भ से आज से लगभग 1080 वर्ष पूर्व नवीं-दसवीं शताब्दी में हुआ था।"
छत्तीसगढ़ी साहित्य : भाषा साहित्य पर और साहित्य भाषा पर अवलंबित होते है। इसीलिये भाषा और साहित्य साथ-साथ पनपते है। परन्तु हम देखते है कि छत्तीसगढ़ी लिखित साहित्य के विकास अतीत में स्पष्ट रुप में नहीं हुई है। अनेक लेखकों का मत है कि इसका कारण यह है कि अतीत में यहाँ के लेखकों ने संस्कृत भाषा को लेखन का माध्यम बनाया और छत्तीसगढ़ी के प्रति ज़रा उदासीन रहे। इसीलिए छत्तीसगढ़ी भाषा में जो साहित्य रचा गया, वह करीब एक हज़ार साल से हुआ है।
अनेक साहित्यको ने इस एक हजार वर्ष को इस प्रकार विभाजित किया है :
छत्तीसगढ़ी गाथा युग: सन् 1000 से 1500 ई। तक
छत्तीसगढ़ी भक्ति युग - मध्य काल,सन् 1500 से 1900 ई। तक
छत्तीसगढ़ी आधुनिक युग: सन् 1900 से आज तक
ये विभाजन साहित्यिक प्रवृत्तियों के अनुसार किया गया है यद्यपि प्यारेलाल गुप्त जी का कहना ठीक है कि - "साहित्य का प्रवाह अखण्डित और अव्याहत होता है।" यह विभाजन किसी प्रवृत्ति की सापेक्षिक अधिकता को देखकर किया गया है।एक और उल्लेखनीय बत यह है कि दूसरे आर्यभाषाओं के जैसे छत्तीसगढ़ी में भी मध्ययुग तक सिर्फ पद्यात्मक रचनाएँ हुई है।
संस्कृति : आदिवासी कला काफी पुरानी है । हिंदी लगभग सभी जगह बोली जाती है पर मूल भाषा छत्तीसगढ़ी है।
छत्तीसगढ़ के लोकगीत और लोकनृत्य :छत्तीसगढ़ के गीत दिल को छु लेती है यहाँ की संस्कृति में गीत एवं नृत्य का बहुत महत्व है। इसीलिये यहाँ के लोगों में सुरीलीपन है। हर व्यक्ति थोड़े बहुत गा ही लेते है। और सुर एवं ताल में माहिर होते ही है। यहां के गीतों में से कुछ हैं:
छत्तीसगढ़ के लोकगीत : छत्तीसगढ़ के लोकगीत में विविधता है, गीत अपने आकार में छोटे और गेय होते है। गीतों का प्राणतत्व है भाव प्रवणता। छत्तीसगढ़ी लोकभाषा में गीतों की अविछिन्न परम्परा है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख और लोकप्रिय गीतों है - सुआगीत, ददरिया, करमा, डण्डा, फाग, चनौनी, बाँस गीत, राउत गीत, पंथी गीत।
सुआ, करमा, डण्डा, पंथी गीत नृत्य के साथ गाये जाते है। सुआ गीत करुण गीत है जहां नारी सुअना (तोता) की तरह बंधी हुई है। गोंड जाति की नारियाँ दीपावली के अवसर पर आंगन के बीच में पिंजरे में बंद हुआ सुआ को प्रतीक बनाकर (मिट्टी का तोता) उसकेचारो ओर गोलाकार वृत्त में नाचती गाती जाती हैं। इसालिए अगले जन्म में नारी जीवन पुन न मिलने ऐसी कामना करती है।
राऊत गीत दिपावली के समय गोवर्धन पूजा के दिन राऊत जाति के द्वारा गाया जाने वाला गीत है। यह वीर-रस से युक्त पौरुष प्रधान गीत है जिसमें लाठियो द्वारा युद्ध करते हुए गीत गाया जाता है। इसमें तुरंत दोहे बनाए जातें हैं और गोलाकार वत्त में धूमते हुए लाठी से युद्ध का अभ्यास करते है। सारे प्रसंग व नाम पौराणिक से लेकर तत्कालीन सामजिक/राजनीतिक विसंगतियों पर कटाक्ष करते हुए पौरुष प्रदर्शन करते है।
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