1862 ई.में ब्रिटिश सरकार ने वनों के प्रबंध के लिये वन-विभाग की स्थापना की थी, किन्तु रियासतों के नरेशों ने वन की सुरक्षा तथा प्रबंध की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। अतः आजादी के पश्चात् छत्तीसगढ़ के वन, वन-विभाग के अन्तर्गत आ गये। छत्तीसगढ़ राज्य का 59285.27 हेक्टेअर भू-भाग वनों से आच्छादित है, जो प्रदेश के कुल भू-क्षेत्रफल का 43.85 प्रतिशत है। बघेलखण्ड पठार का लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र प्राकृतिक वनस्पति से ढका है। कोरिया के बलुआ पत्थरों के क्षेत्र में साल के वनों का आधिक्य है। यहाँ साल के वन सर्वत्र मिलते हैं। जशपुर-सामरी पाट प्रदेश में उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन पाये जाते हैं। यहाँ पर चौड़ी पत्ती वाले वन पाये जाते हैं, जिनके वृभ ग्रीष्म ऋतु में पत्तियाँ गिरा देते हैं। जशपुर-सामरी पाट प्रदेश के दक्षिणी दो-तिहाई भाग में उष्ण-कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन मिलते हैं। यहां साल के वन अधिकांश जशपुर तहसील में पाये जाते हैं। सामरी तहसील में अधिकतर मिश्रित वन पाये जाते हैं। सामरी तहसील में शुष्क साल वन भी मिलते हैं। यहाँ साल के अतिरिक्त बीजा, जामुन, महुआ तथा सेंजा भी पाये जाते हैं।
दंडकारण्य प्रदेश में पायी जाने वाली वनस्पति उष्ण-कटिबंधीय आर्द्र पर्णपाती वन हैं। जिनमें साल के वृक्षों की प्रधानता है। साल के अतिरिक्त सागौन वृक्ष पाये जाते हैं। सामरी तहसील में शुष्क साल वन भी मिलते हैं। यहां साल के अतिरिक्त बीजा, जामुन, महुआ तथा सेंजा के वृक्ष पाये जाते हैं। कहीं-कहीं बाँस के वन भी पाये जाते हैं।महानदी बेसिन के छत्तीसगढ़ बेसिन में वनों का क्षेत्र नगण्य है, जबकि उच्चभूमि वाली तहसीलों में आधी से अधिक भूमि वनों से आच्छादित है। यहाँ पाये जाने वाले वनों में साल, सागौन तथा मिश्रित वन मिलते हैं। बेसिन के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र को छोड़कर सभी भागों में साल के वन पाये जाते हैं या फिर मिश्रित वन मिलते हैं। सागौन के वन दक्षिणी तथा पश्चिमी भागों में पाये जाते हैं। साल तथा सागौन के अतिरिक्त अन्य प्रकार के वृक्ष मिलते है।
वनों से साल, सागौन, बाँस आदि प्रमुख संपत्ति प्राप्त होती है, जबकि गौण संपत्ति में लाख, तेंदू पत्ता, कत्था, हर्रा, विभिन्न प्रकार के गोंद, दवाओं के लिये पौधे तथा विभिन्न प्रकार की घासें हैं। खैर के वृक्ष सरगुजा में बहुतायत से मिलते हैं। लाख के कारखाने धमतरी, रायगढ़, मनेन्द्रगढ़, पेन्ड्रा चाँपा तथा सक्ती आदि में हैं। तेंदूपत्ता बिलासपुर, रायपुर, सरगुजा, बस्तर, काँकेर आदि में उत्तम किस्म का पाया जाता है। बाँस का प्रयोग पेपर मिलों में किया जाता है। वन छत्तीसगढ़ के लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार के रोजगार उपलब्ध कराने का भी प्रमुख स्त्रोत है, साथ ही यहाँ के जंगल जलाऊ लकड़ी का भी प्रमुख साधन हैं। यहाँ के वनों में प्रमुखतः नीम्न वृक्षों को प्रजातियाँ पायी जाती हैं। जिनके मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं-
साल : बस्तर अपने साल वनों के लिये प्रसिद्ध है। साल की लकड़ी मुख्यतः इमारतों के निर्माण में एवं रेल्वे स्लीपर बनाने के उपयोग में आती है।
सागौन : सागौन की लकड़ी भी इमारती लकड़ी है। जिसकी माँग सम्पूर्ण भारत में है। ये घरों तथा लकड़ी का सामान बनाने के उपयोग में आती है।
तेंदूपत्ता : बीड़ी उद्योग का आधार तेंदूपत्ता छत्तीसगढ़ की प्रमुख उपज है। इस प्रकार वनोपज की प्रधानता के कारण छत्तीसगढ़ के वनोपज पर आधारित लगभग 10,000 औद्योगिक इकाईयाँ हैं। इनमें 306 पंजीकृत कारखाने हैं।
बाँस : छत्तीसगढ़ के वन बाँस उत्पादन के लिये विख्यात हैं । बाँस का उपयोग घर बनाने के लिये किया जाता है। तकनीकी ज्ञान के द्वारा यह संभव हो सका है कि बाँस की लुगदी से कागज बनाया जाता है। अमलाई और नेपानगर के कागज कारखानों में बाँस का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ की कमार जनजाति के लोग बाँस के वनों पर आश्रित हैं। वे बाँस के बर्तन, टोकरी, सजावटी बस्तुयें आदि बनाकर अपना जीवन-यापन करते हैं।
अन्य वनोपज : लघु वनोपजों में लाख, महुआ, फूल, आंवला, हर्रा, गोंद, कत्था, कोसा, इमली आदि हैं। इन लघु वनोपज से संकलित उद्योगों में आटा मिल, बैंलगाड़ी के चक्के, फर्नीचर, बीड़ी, हर्रा तथा कत्था उद्योग शामिल है।छत्तीसगढ़ की मुख्य उपजों में से बाँस, सागौन, साल, तेन्दुपत्ता लाख प्रमुख हैं । इसके अलावा साजा, धीरा, कर्रा, सरई, बीजा, अर्जुन, महुआ, बबूल, आंवला, शीशम, तेन्दु, खैर, हल्दू, कुसुम, चार, कहवा आदि के वृक्ष भी यहाँ मिलते हैं।अन्य गौण उपजें साल बीज, फलों में बेल, आंवला, हर्रा, कोसम बहेड़ा, आम, जामुन, सीताफल, बेर, भिलावा सिंघाड़ा, तेन्दु महुआ, कत्था, गौंद, शहद एवं मोम, रेशम आदि हैं।
स्रोत: www.cgculture.in
मंगलवार, 19 मई 2009
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जवाब देंहटाएंSal or sogun ka kitna percent h
जवाब देंहटाएंKaran peadh jo cg me pai jati hai ki jankari uplabdh krae
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