देश के नक्शे पर उभरा छब्बीसवाँ राज्य छत्तीसगढ़ पुराने मध्यप्रदेश से काटकर बनाया गया नया राज्य। वैसे शताब्दियों से छत्तीसगढ का अस्तित्व एक अलग इकाई के रुप में रहा है। पहले इसे दक्षिण कोसल कहा जाता था। मिथक कथाओं के अनुसार इस राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या के नाम पर इस इलाक़े का नाम कोसल पड़ा था। कथा यह भी है कि राम अपने वनवास के दौरान छत्तीसगढ़ से ही गुज़रे थे और शबरी ने राम को बेर यहीं खिलाए थे। एक कथा महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। इसके आधार पर कुछ इतिहासकार मानते हैं कि बिलासपुर के पांडो, कोरवा और कंवर जनजातियों को पांडव और कौरवों से जोड़कर देखते हैं। इन कथाओं का कोई प्रमाण तो नहीं लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मानव प्रजाति के विकास के लिए छत्तीसगढ़ उपयुक्त जगह थी और पाषाण युग के अवशेष बताते हैं कि यहाँ मानव सभ्यता का विकास हो रहा था। रायगढ़ के कबरा पहाड़ और सिंघनपुर की गुफ़ाओं में मिले भित्तिचित्र भी काफ़ी कुछ कहते हैं।
कलचुरि राजवंश और नामाकरण : छत्तीसगढ की एक इकाई के रुप में पहचान का सबसे प्रामाणिक इतिहास कलचुरि राजाओं का शासन काल है। 1000 ई. में पहला कलचुरि राजा कलिंगराज कोसल पहुँचा था। उसके बेटे रत्नदेव ने अपने राज्य की राजधानी रत्नपुर में बनाई जिसे आज रतनपुर के नाम से जाना जाता है। बाद में इसी राजवंश की एक शाखा की राजधानी रायपुर में भी स्थापित हुई। इतिहास बताता है कि कलचुरि राजा कुशल प्रशासक थे और शासन के विकेंद्रीकरण के हामी थे। कलचुरि राजाओं ने कुछ प्रशासनिक इकाइयाँ बनाईं। सबसे छोटी इकाई थी बरहा। बारह गाँव का बरहा और सात बरहों का एक गढ़ यानी 84 गाँवों का एक गढ़। हालांकि यह लचीली व्यवस्था थी और गाँवों की संख्या भौगोलिक ज़रुरतों के अनुसार कम-ज़्यादा होती रहती थी लेकिन गढ़ यहीं से शुरु हुए। कलचुरि शासन दो हिस्सों में बँटा था। एक शिवनाथ के उत्तर में और दूसरा शिवनाथ के दक्षिण में दोनों ओर 18-18 प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। दोनों ओर 18 गढ़ इस तरह कलचुरियों के 36 गढ़ थे और यही नामकरण का आधार बना। लेकिन इस छत्तीसगढ़ में बस्तर शामिल नहीं था वह बाद में मुगलों और मराठों के शासन काल में शामिल हुआ। मराठों ने छत्तीसगढ को एक अलग प्रशासनिक इकाई माना लेकिन वे शासन नागपुर से करते रहे. अंग्रेज़ आए तो उन्होंने भी छत्तीसगढ़ का शासन बहुत समय तक नागपुर से ही संभाला। मराठों से पूरी तरह सत्ता हथियाने के बाद उन्होंने राजधानी को रायपुर स्थानांतरित किया।
विद्रोह और आंदोलन :1857 में विद्रोह की लहर छत्तीसगढ़ तक भी आई और यहाँ भी सेना ने बगावत किया। लेकिन इसका परिमाण बड़ा नहीं था और दूसरी जगहों की तरह यहाँ भी इसे कुचल दिया गया। लेकिन इस विद्रोह के बाद प्रशासनिक संगठन का काम शुरु हुआ और 1860 में मध्य प्रांत का गठन हुआ। नागपुर, महाकोसल और छत्तीसगढ़ को मिलाकर वे सीपी एंड बरार कहते थे। इसमें छोटी-छोटी 14 रियासतें थीं।
आज़ादी के बाद : 1947 के बाद इस इलाक़े को चार हिस्सों में बाँट दिया गया। मध्यभारत, महाकोसल, विंध्य प्रदेश और भोपाल। इस व्यवस्था में छत्तीसगढ़ महाकोसल का हिस्सा था। 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसार भाषाई आधार पर राज्यों का गठन हुआ। भाषाओं के आधार पर राज्य बनाने के बाद बीच का बचा हुआ हिस्सा, जो भाषा के आधार पर अपनी कोई अलग पहचान नहीं रखता था मध्यप्रदेश कहलाया और छत्तीसगढ़ इसी मध्यप्रदेश का हिस्सा बन गया। वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य का सवाल पुनर्गठन आयोग के सामने आया था लेकिन वो बड़े राज्यों का ज़माना था इसलिए उस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। छत्तीसगढ़ की अलग पहचान को लेकर सवाल यदाकदा उठते रहे लेकिन खूबचंद बघेल ने इसे सुगठित रुप देने की कोशिश की। 1956 से लेकर 1969 तक उन्होंने छत्तीसगढ़ के लोगों को संगठित करने की कई कोशिशें कीं। बाद में पवन दीवान ने इस कोशिश को आगे बढ़ाया लेकिन वे भी कोई दमदार आंदोलन खड़ा न कर सके। छत्तीसगढ़ का सबसे सुगठित आंदोलन 1977 से 1990 के बीच शंकर गुहा नियोगी ने छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा बनाकर चलाया लेकिन इसका सीधा ताल्लुक़ छत्तीसगढ़ राज्य की अलग पहचान से कुछ कम था मज़दूर आंदोलनों से अधिक था। लेकिन यह स्पष्ट था कि छत्तीसगढ़ को लेकर एक महत्वाकांक्षा इस आंदोलन में जाग चुकी थी और इस मोर्चा को एक राजनीतिक इकाई में तब्दील कर दिया गया था। लेकिन नियोगी की हत्या से एक मज़बूत आंदोलन एकाएक बिखर गया।
राज्य निर्माण : 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में एक अशासकीय संकल्प पारित करके छत्तीसगढ़ राज्य की मांग की गई। इसके बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने इस मांग को अपने चुनावी घोषणा पत्र में इस मांग को शामिल करना शुरु कर दिया। 1998 के लोकसभा चुनाव के समय भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने चुनाव प्रचार करते हुए छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का वादा किया और फिर उनकी सरकार बन गई तो यह मुद्दा एकाएक गरमा गया। राज्य बनाने का चुनावी नारा एक हकीकत में बदलने लगा। एक बार भाजपा की सरकार गिर गई फिर नए चुनाव हुए लेकिन नए राज्य का वादा बना रहा। उत्तरांचल और झारखंड के लोगों ने अपने लिए राज्य मांगने के लिए जो गंभीर आंदोलन किए थे उसकी तुलना में छत्तीसगढ़ में राज्य को लेकर कोई जनचेतना नहीं थी। लेकिन उन दोनों राज्यों के साथ छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के लिए विधेयक बन गया। मध्यप्रदेश राज्य पुर्निर्माण विधेयक 2000 को 25 जुलाई 2000 में लोकसभा में पेश किया गया। इसी दिन बाक़ी दोनों राज्यों के विधेयक भी पेश हुए। 31 जुलाई को छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण का विधेयक लोकसभा से पारित हो गया। 9 अगस्त को राज्यसभा ने भी इसे पारित कर दिया और 25 अगस्त को राष्ट्रपति ने इसे मंज़ूरी दे दी। पहली नवंबर 2000 से देश के नक्शे पर छत्तीसगढ़ नाम का एक नया राज्य बन गया। जनता और जननेताओं की उम्मीद से पहले ही छत्तीसगढ़ राज्य बन गया।
स्रोत: विकिपीडिया
बुधवार, 20 मई 2009
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